आधी दुनिया की अनदेखी दास्ताँ: क्या 2026 में चरागाह बचा पाएंगे हमारा भविष्य?

 

17 जून मरुस्थलीकरण दिवस, मरुस्थलीकरण दिवस की थीम, मरूस्थल,


हम जिसे अक्सर 'बंजर' या 'बेकार' जमीन कहकर नजरअंदाज कर देते हैं, वह असल में पृथ्वी का सबसे बड़ा जीवित बैंक है। वैश्विक मानचित्र पर जब हम 'संरक्षण' की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान अक्सर घने वर्षावनों या नीले महासागरों पर टिक जाता है। लेकिन एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र है जो पृथ्वी के आधे से भी अधिक हिस्से को कवर करता है, फिर भी हमारी नीतियों और प्राथमिकताओं में वह हाशिए पर है। ये हैं हमारे चरागाह (Rangelands)

एक पर्यावरण नीति विशेषज्ञ के तौर पर, मैं इन्हें केवल घास के मैदान नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता की धुरी मानता हूँ। आज जब जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा का संकट हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, तो इन धूल भरे मैदानों में छिपा 'पारिस्थितिक खजाना' ही हमारा सबसे बड़ा रक्षक साबित हो सकता है।

1. एक छिपा हुआ विशालकाय: पृथ्वी का 54% हिस्सा

चरागाह दुनिया के सबसे बड़े और सबसे कम समझे गए पारिस्थितिकी तंत्र हैं। यह केवल खुली घास की जमीन नहीं है; इसमें झाड़ियाँ, सवाना, टुंड्रा और यहाँ तक कि रेगिस्तान भी शामिल हैं।

प्रमुख सांख्यिकी (Source: UNCCD):

  • क्षेत्रफल: पृथ्वी की कुल भूमि का 54% हिस्सा (लगभग 80 मिलियन वर्ग किलोमीटर)।
  • शुष्क क्षेत्र का दबदबा: इन चरागाहों का 78% हिस्सा (लगभग 62 मिलियन वर्ग किलोमीटर) अत्यंत शुष्क क्षेत्रों (Arid Zones) में स्थित है।
  • आजीविका का आधार: दुनिया भर में 2 अरब लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन पर निर्भर हैं।
  • खाद्य सुरक्षा: वैश्विक खाद्य उत्पादन का 16% और घरेलू शाकाहारी पशुओं के चारे का 70% यहीं से आता है।

इतने विशाल हिस्से को "अनुपयोगी" मानकर छोड़ देना आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी नीतिगत भूल रही है। आज इनमें से लगभग 50% चरागाह क्षरण (Degradation) के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं, जिससे 'भूमि क्षरण तटस्थता' (Land Degradation Neutrality - LDN) का लक्ष्य खतरे में है।

2. पशुधन का विरोधाभास: असंतुलित प्रणालियों का विज्ञान

पारिस्थितिकी विज्ञान में एक शब्द है—'असंतुलित प्रणालियाँ' (Disequilibrium Systems)। चरागाह इसी श्रेणी में आते हैं। यहाँ 'शांति' का अर्थ स्वास्थ्य नहीं है; इन जमीनों को स्वस्थ रहने के लिए चराई (grazing) या आग जैसी प्राकृतिक हलचलों की आवश्यकता होती है। पशुधन का विरोधाभास यही है: जब जानवर सही तरीके से जमीन पर चलते हैं, तो वे उसे नष्ट नहीं करते, बल्कि उसे बहाल (restore) करते हैं।

जिम्बाब्वे के 'होलिस्टिक प्लान्ड ग्रेजिंग' मॉडल ने साबित किया है कि "गुच्छित" (Bunched) चराई पद्धति मिट्टी के लिए वरदान है। यह जंगली शाकाहारी जानवरों के प्राकृतिक संचलन की नकल करती है। पशुओं के खुर मिट्टी की सख्त पपड़ी को तोड़ते हैं, जिससे बारिश का पानी गहराई तक जाता है, और उनका प्राकृतिक खाद जमीन को पुनर्जीवित करता है।

"उचित रूप से प्रबंधित पशुधन न केवल खराब हो चुकी भूमि को पुनर्जीवित कर सकता है, बल्कि यह ग्रामीण आजीविका को सूखे के प्रति लचीला बनाने का सबसे सशक्त जरिया है।" — अफ्रीका सेंटर फॉर होलिस्टिक मैनेजमेंट

3. औपनिवेशिक विरासत और "पशु चिकित्सा प्रतिबंध बाड़" की त्रासदी

चरागाहों के विनाश की जड़ें अक्सर औपनिवेशिक नीतियों में छिपी हैं, जिन्होंने पारंपरिक 'गतिशीलता' को अराजकता समझा। दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया जैसे देशों में, 50% से 90% तक उपजाऊ भूमि श्वेत बसने वालों द्वारा अधिग्रहित कर ली गई थी।

सबसे बड़ी त्रासदी 'पशु चिकित्सा प्रतिबंध बाड़' (Veterinary Cordon Fences) के रूप में सामने आई। पशु रोगों को नियंत्रित करने के नाम पर खड़ी की गई इन बाड़ों ने चरवाहों के सदियों पुराने मार्गों को बंद कर दिया। जब पशुओं की गतिशीलता रुकी, तो वे एक ही स्थान पर रहने को मजबूर हुए, जिससे 'ओवरग्रेजिंग' हुई और अंततः समृद्ध चरागाह धूल के मैदानों में बदल गए।

4. गतिशीलता ही बुनियादी ढांचा है: एक मानवीय कहानी

चरवाहों का प्रवास कोई बेमकसद भटकन नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक जलवायु अनुकूलन उपकरण है। अंगोला का उदाहरण देखें, जहाँ 1975 से 2002 तक चले लंबे गृहयुद्ध ने पारंपरिक प्रबंधन प्रणालियों को ध्वस्त कर दिया था।

युद्ध के बाद, 'RETESA' प्रोजेक्ट के माध्यम से पारंपरिक 'Jangos' (सामुदायिक मंचों) को फिर से जीवित किया गया। यहाँ चरवाहे बारिश में ऊंचे पहाड़ी इलाकों और सूखे में निचले बाढ़ के मैदानों के बीच प्रवास करते हैं। यह 'मौसमी आवाजाही' जमीन को प्राकृतिक रूप से बहाल होने का समय देती है। यह साबित करता है कि आधुनिक सीमाओं के बजाय पारंपरिक लचीलापन ही वास्तविक 'पारिस्थितिक बुनियादी ढांचा' है।

5. पारिस्थितिक बुद्धिमत्ता: प्राचीन ज्ञान बनाम आधुनिक शासन

स्थानीय चरवाहों के पास वह 'पारिस्थितिक बुद्धिमत्ता' (Ecological Intelligence) है जिसे आधुनिक तकनीक अक्सर पकड़ने में विफल रहती है। दक्षिण अफ्रीका में, सांप्रदायिक क्षेत्र केवल 17% कृषि भूमि पर स्थित हैं, लेकिन वे देश की 72% बकरियों और 52% मवेशियों का पेट भरते हैं। यह इन प्रणालियों की असाधारण दक्षता को दर्शाता है।

नामीबिया का CBNRM (Community-Based Natural Resource Management) मॉडल एक वैश्विक मिसाल है। जब समुदायों को कानूनी अधिकार दिए गए, तो वन्यजीवों की आबादी बढ़ी और पर्यटन से होने वाली आय सीधे स्थानीय लोगों तक पहुँची। यह इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि प्रकृति का संरक्षण और मानव आजीविका एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

6. 2026: चरागाहों के लिए 'सुपर ईयर' और $1 बिलियन का लक्ष्य

विश्व समुदाय अब एक ऐतिहासिक मोड़ पर है। संयुक्त राष्ट्र ने 2026 को 'अंतर्राष्ट्रीय चरागाह और चरवाहा वर्ष' (IYRP) घोषित किया है। अगस्त 2026 में, मंगोलिया UNCCD COP17 की मेजबानी करेगा, जो इस पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक निर्णायक मोड़ होगा।

इस वर्ष के मुख्य आकर्षण होंगे:

  • Rangelands Flagship Initiative: चरागाहों की बहाली के लिए $1 बिलियन (लगभग 8400 करोड़ रुपये) जुटाने का महत्वाकांक्षी वैश्विक लक्ष्य।
  • एक महाकाव्य यात्रा: रियाद (COP16) से उलानबटोर (COP17) तक की ऐतिहासिक 'सिल्क रोड' यात्रा, जो चरागाहों के संरक्षकों और उनकी समस्याओं को वैश्विक नीति के केंद्र में लाएगी।
  • मंत्र: "पहचानें। सम्मान करें। बहाल करें।" (Recognize. Respect. Restore.)

निष्कर्ष: एक भविष्योन्मुखी विचार

चरागाहों की बहाली केवल पर्यावरण का तकनीकी मुद्दा नहीं है; यह सामाजिक न्याय, गरीबी उन्मूलन और वैश्विक शांति का मार्ग है। यदि हम उन समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का सम्मान नहीं करते जो आधी दुनिया के संरक्षक हैं, तो हम केवल मिट्टी नहीं, बल्कि अपना भविष्य खो रहे हैं।

एक विचारोत्तेजक प्रश्न: क्या हम उस भूमि और उन लोगों का सम्मान करने के लिए तैयार हैं जो आधी दुनिया को सहारा देते हैं, या हम तब तक आँखें मूँदे रहेंगे जब तक कि हमारा यह 'जीवित बैंक' स्थायी रूप से दिवालिया न हो जाए?