क्या वानर भी 'दिखावा' कर सकते हैं? कान्ज़ी की काल्पनिक टी-पार्टी से मिले 5 चौंकाने वाले सबक

 


क्या आपको बचपन के वे दिन याद हैं जब आप खाली कपों से चाय पीने का नाटक करते थे या अपनी गुड़ियों के साथ एक 'टी-पार्टी' आयोजित करते थे? कल्पना करने और वास्तविकता से परे 'दिखावा' (Pretend Play) करने की यह क्षमता लंबे समय तक केवल इंसानों की खूबी मानी जाती रही। लेकिन क्या होगा अगर मैं आपसे कहूँ कि हमारे सबसे करीबी रिश्तेदार भी अपनी आँखों के सामने एक अदृश्य दुनिया बुन सकते हैं?

'कान्ज़ी' (Kanzi) नाम के एक असाधारण बोनोबो ने विज्ञान की इस पुरानी धारणा को हिला कर रख दिया है। कान्ज़ी कोई साधारण वानर नहीं था; वह लेक्सिग्राम (Lexigrams) के माध्यम से इंसानों से बात कर सकता था, यहाँ तक कि वह 'माइनक्राफ्ट' (Minecraft) जैसे जटिल वीडियो गेम खेलने में भी माहिर था। एक विकासवादी प्राइमेटोलॉजिस्ट के रूप में, मैं कान्ज़ी को उसकी प्रजाति का 'आइंस्टीन' मानता हूँ, जिसके मानसिक जीवन ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हमारी कल्पना की जड़ें कितनी गहरी हैं।

1. काल्पनिक 'जूस' और 'कठपुतली के खेल' की शुरुआत

वैज्ञानिकों को पहली बार कान्ज़ी की कल्पनाशीलता का अहसास एक औपचारिक प्रयोग से नहीं, बल्कि एक सहज बातचीत से हुआ। साल 2023 में जब मनोवैज्ञानिक अमलिया बास्तोस (Amalia Bastos) पहली बार कान्ज़ी से मिलीं, तो कान्ज़ी ने लेक्सिग्राम बोर्ड पर 'पीछा करना' (Chase) और 'गुदगुदी करना' (Tickle) के प्रतीकों को चुना। अमलिया और उनके साथी ने सच में एक-दूसरे का पीछा करने के बजाय केवल इसका नाटक किया। कान्ज़ी इस 'कठपुतली के खेल' को देखकर बेहद खुश और संतुष्ट था। वह जानता था कि वे सच में नहीं लड़ रहे हैं, फिर भी वह उस काल्पनिक दृश्य का आनंद ले रहा था।

इसी घटना ने यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट एंड्रयूज और जॉन्स हॉपकिन्स के शोधकर्ताओं को 'काल्पनिक जूस' वाला प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कान्ज़ी के सामने दो खाली जग रखे और नाटक किया कि वे उनमें जूस डाल रहे हैं। फिर एक कप से 'काल्पनिक जूस' वापस जग में डालने का अभिनय किया गया।

  • मुख्य डेटा: जब कान्ज़ी से पूछा गया कि जूस कहाँ है, तो उसने 68% बार उस सही कप की पहचान की जिसमें काल्पनिक जूस को ट्रैक किया गया था।
  • वैज्ञानिक विश्लेषण: यह महज नकल नहीं थी। यह 'सेकेंडरी रिप्रेजेंटेशन' (Secondary representation) का प्रमाण है, जहाँ मस्तिष्क एक ऐसी वस्तु की मानसिक छवि बनाता है जो वहाँ मौजूद ही नहीं है। यह हमारे पूर्वजों की दिमागी बनावट का एक जीवंत अवशेष है।

2. कल्पना और हकीकत के बीच की महीन रेखा

अक्सर आलोचक तर्क देते हैं कि शायद कान्ज़ी असली और नकली के बीच का फर्क नहीं समझता था। इसे परखने के लिए एक कड़ा परीक्षण किया गया। कान्ज़ी के सामने एक तरफ असली संतरे का जूस रखा गया और दूसरी तरफ 'काल्पनिक जूस' वाला खाली कप।

  • मुख्य डेटा: कान्ज़ी ने 80% बार असली जूस को चुना।

इससे यह साफ हो गया कि वह भ्रमित नहीं था। वह जानता था कि 'काल्पनिक जूस' केवल एक विचार है, वास्तविकता नहीं।

"कान्ज़ी एक काल्पनिक वस्तु का विचार पैदा करने और साथ ही यह जानने में सक्षम है कि वह वास्तविक नहीं है। यह खोज हमें इस पर पुनर्विचार करने के लिए आमंत्रित करती है कि हमें क्या 'विशेष' बनाता है।" — अमलिया बास्तोस (Amalia Bastos), तुलनात्मक मनोवैज्ञानिक

3. दूसरों की अज्ञानता को पहचानना (Theory of Mind)

फरवरी 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में कान्ज़ी और उसके साथियों—न्योता (Nyota) और टेको (Teco)—ने अपनी बुद्धिमानी की एक और परत दिखाई। शोधकर्ताओं ने एक कप के नीचे अंगूर छिपाया। कभी इंसानी पार्टनर ने उसे छिपते हुए देखा, तो कभी वह उस समय कमरे में नहीं था।

  • मुख्य बिंदु: वानर तब अधिक और तेज़ी से इशारा (Point) करके मदद करते थे जब उनका पार्टनर 'अज्ञानी' (Ignorant) होता था। यदि पार्टनर को पहले से पता होता कि इनाम कहाँ है, तो वानर शांत रहते थे।
  • निष्कर्ष: इसे 'थ्योरी ऑफ माइंड' (Theory of Mind) यानी दूसरे के नजरिए को समझना कहते हैं। वानर एक साथ दो अलग-अलग 'विश्व दृष्टिकोण' को अपने मन में रख सकते हैं—एक वह जो वे खुद जानते हैं, और दूसरा वह जो उनका पार्टनर नहीं जानता।

4. 90 लाख साल पुरानी विरासत और 'मानवीय' परवरिश का प्रभाव

इन निष्कर्षों का विकासवादी महत्व गहरा है। कान्ज़ी की ये क्षमताएं यह बताती हैं कि कल्पना की शक्ति शायद हमारे और वानरों के साझा पूर्वजों में 60 से 90 लाख साल पहले ही मौजूद रही होगी। हालांकि, यहाँ एक महत्वपूर्ण पेंच है: कान्ज़ी एक 'एनकल्चरर्ड' (Enculturated) वानर था, यानी उसका पालन-पोषण इंसानी वातावरण और संवाद के बीच हुआ था।

वैज्ञानिक डेटा के अनुसार, इस उच्च-स्तरीय 'दिखावा करने वाले खेल' (Level 5 Play) तक पहुँचने के लिए इंसानी सामाजिक संपर्क और भाषा का होना एक चाबी (Key) की तरह काम करता है, जो वानरों के भीतर छिपी इस क्षमता के द्वार खोल देता है।

"कल्पना को लंबे समय से मानवीय होने का एक अनिवार्य तत्व माना गया है। यह विचार कि यह क्षमता केवल हमारी प्रजाति तक सीमित नहीं है, पूरी तरह से परिवर्तनकारी है।" — क्रिस्टोफर क्रुपेन्ये (Christopher Krupenye), मनोवैज्ञानिक, जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी

5. आविष्कार: बिना कल्पना के असंभव

संज्ञानात्मक वैज्ञानिक कैथल ओ'मैडागेन (Cathal O'Madagain) एक बहुत ही सटीक तर्क देते हैं। वह कहते हैं कि जानवरों द्वारा औजारों का उपयोग केवल 'संयोग' नहीं हो सकता।

  • तर्क: "आप तब तक साइकिल का आविष्कार नहीं कर सकते जब तक आप उसकी पहले कल्पना न करें।" यदि कान्ज़ी अदृश्य वस्तुओं को ट्रैक कर सकता है और काल्पनिक दुनिया बना सकता है, तो वानरों द्वारा पत्थर के औजार बनाना महज शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि एक सोची-समझी 'मानसिक योजना' है। उनकी कल्पना ही उनके आविष्कारों की जननी है।

निष्कर्ष: कान्ज़ी की विरासत और हमारा साझा भविष्य

मार्च 2025 में, 44 वर्ष की आयु में कान्ज़ी की मृत्यु ने वैज्ञानिक जगत को स्तब्ध कर दिया। वह अपनी मृत्यु के एक दिन पहले तक बिल्कुल स्वस्थ था, अपने भतीजे टेको के साथ खेल रहा था और साथियों की ग्रूमिंग (Grooming) कर रहा था। उसकी अचानक मृत्यु हृदय रोग की वजह से हुई, लेकिन वह अपने पीछे एक अमूल्य विरासत छोड़ गया है।

कान्ज़ी ने साबित कर दिया कि हम पृथ्वी के एकमात्र 'कल्पनाशील' जीव नहीं हैं। उसने हमारे 'मानवीय अहंकार' को चुनौती दी और हमें यह सिखाया कि समृद्ध मानसिक जीवन केवल हमारी जागीर नहीं है।

अंतिम प्रश्न: यदि वानर एक काल्पनिक टी-पार्टी का आनंद ले सकते हैं और हमारी अज्ञानता को समझकर हमारी मदद कर सकते हैं, तो प्रकृति में और कौन-से सुंदर और जटिल दिमाग छिपे हो सकते हैं? क्या हम अब भी खुद को सबसे 'विशेष' कहने का साहस कर सकते हैं, या हम भी उसी महान विकासवादी कहानी का एक छोटा सा हिस्सा मात्र हैं?